राष्ट्रधर्म की ज्वलंत उदाहरण है गोरक्षपीठ: गोरक्षपीठाधीश्वर

» गोरक्षपीठ एवं गोरखपुर के वर्तमान स्वरूप के शिल्पी योगिराज बाबा गम्भीरनाथ का किया स्मरण।


»धारा 370 और 35 ए का हटना दोनों पूज्य महाराज के लिए है सच्ची श्रद्धांजलि: योगी आदित्यनाथ


» समारोह के मुख्य अतिथि थे अयोध्या धाम से पधारे जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी वासुदेवाचार्यी। 



गोरखपुर - उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि राष्ट्र की रक्षा भी सन्यासी का प्रथम कर्तव्य है और यह परम्परा गोरक्षपीठ के माध्यम से सदैव जारी रहेगी। मुख्यमंत्री मंगलवार को यहां गोरखनाथ मंदिर परिसर में ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 50वीं एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ की पाचवीं पुण्यतिथि समारोह के तहत महंत दिग्विजयनाथ की श्रद्धांजलि सभा को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की क्रन्ति और चौरी-चौरा कांड में भी गोरक्षपीठ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है जो राष्ट्रधर्म की ज्वलंत उदाहरण है। उन्होंने कहा कि गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वरों द्वारा प्रारम्भ की गई यह परम्परा आगे भी निरन्तर चलती रहेगी। उन्होनें कहा कि हमारे पूर्व के पीठाधीश्वरों ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि व्यक्तिगत धर्म से राष्ट्रधर्म बड़ा है। यदि व्यक्ति का विकास चाहिए तो राष्ट्र का विकास उसकी अनिवार्य शर्त है। समर्थ भारत और समृद्धि की पूरी परिकल्पना भारत के संविधान में निहित हैभारत के अनेक मनीषियों एवं बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर ने भारत का जो संविधान हमें दिया है वह उसी भारत के निर्माण का आधार है जैसा भारत हम चाहते है। श्री योगी ने कहा कि भारत की ऋषि परम्परा एवं भारत के संत परम्परा ने जिस भारत की परिकल्पना प्रस्तुत की है उसे हमे भारत के संविधान में देख सकते है। भारतीय संस्कृति में छुआछूत, ऊंचनीच जैसी किसी भेदभाव कोर थान प्राप्त नहीं है और यही बात भारत का संविधान भी कहता है। उन्होंने कहा कि श्रीगोरखनाथ मन्दिर में सभी पंथों के योगी-महात्मा रहते है। दोनों ब्रह्मलीन महन्त ने हि दुत्व को ही श्रीगोरखनाथ मन्दिर का वैचारिक अधिष्ठान बनाया। योगी ने कहा कि गोरक्षपीठ एवं गोरखपुर के वर्तमान स्वरूप के शिल्पी योगिराज बाबा गम्भीरनाथ और उनके तपस्या से पले बढ़े महन्त दिग्विजयनाथ । उन्होंने हर क्षेत्र की अपूर्णता को पूर्णता प्रदान की। नाथ सम्प्रदाय के बिखरे योगी समाज को एक किया और उन्हें धर्म, आध्यात्म के साथ-साथ राष्ट्रोन्मुख किया। हि दुत्व के मूल्यों और आदर्शो की पुनस्थापना के लिए वे राजनीतिक दलदल में कूदे। उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल सम्बन्ध पर तत्कालीन नेहरू सरकार को बार-बार ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की सहायता लेनी पड़ी थी। ब्रह्मलीन महाराज के धर्म, राजनीति, शिक्षा, समाज के सन्दर्भ में विचार आज भी प्रासंगिक है। शिक्षा और स्वास्थ्य की ष्टि से अति पिछड़े इस पूर्वी उत्तर प्रदेश में महन्त दिग्विजयन ने शिक्षणप्रशिक्षण सं थाओं और तकनीकी शिक्षण सं थाओं कीर थापना कर हिदुत्व आधारित सामाजिक परिवर्तन में अपनी सक्रिय भागीदारी निभायी। वह अपने समय के वे धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में एक सशक्त हस्ताक्षर थे। गोरक्षपीठाधीश्वर ने कहा कि महात्मा गांधी द्वारा खिलाफत आन्दोलन के बाद कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति के विरूद्ध कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी राजनीति का शंखनाद किया। आज गोरखपुर में जो कुछ भी गौरव प्रदान करने वाली चीजें हैं उनमें पूज्य दोनों ब्रह्मलीन सन्तों का सर्वाधिक योगदान रहा। उन्होंने कहा कि जब वाराणसी में विश्वनाथ के मन्दिर में दलितों का प्रवेश वर्जित था तब था महन्त दिग्विजयन ने अपने आन्दोलन के माध्यम से मन्दिर का दरवाजा सबके लिए खुलवाया। उन्होंने कहा इसी प्रकार मेरे (योगी) गुरूदेव राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ ने मीनाक्षीपुरम् में दलितों को सम्मान दिलाने के लिए आन्दोलन किया तथा उनके साथ बैठकर सहभोज क माज को जोडने का काम किया। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की सं थाएँ दोनों ब्रह्मलीन महंत के सपनों को साकार करने में अपनी पूर्ण साम्प य का उपयोग करेंयही उन्हें वास्तविक श्रद्धाजलि होगी। समारोह के मुख्य अतिथि अयोध्याधाम से पधारे जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी वासुदेवाचार्य ने कहा कि महन्त दिग्विजयनाथ ने राजनीति को धर्म के खुटे से बाँधा। उन्होंने कहा कि दुनिया के राजनीति इतिहास में इस पीठ ने उस विशिष्ट परम्परा को प्रतिष्ठित किया है जो धर्म और राजनीति को सिक्के का एक पहलू मानती है। जो परम्परा राजनीति को भी लोक कल्याण का साधन मानती हैभारत की इस सनातन परम्परा के वैचारिक अधिष्ठान को इस पीठ ने वर्तमान युग में व्यवहारिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया है। मध्य युग से लेकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम तक व्याप्त धर्म, राष्ट्र और राजनीति को एक साथ साधने का प्रयत्न करने वाले ऋषियों की एक लम्बी परम्परा है मगर वह परम्परा वर्तमान युग में आकर श्रीगोरक्षपीठ में आकार पाती है। वसूदेवाचार्य ने कहा कि इस मठ के पीठाधीश्वर महन्त योगी आदित्यनाथ आज राजनीति और धर्म के एकाकार होने के यदि प्रतिमान बने हैं तो उसका श्रेय महन्त दिग्विजयनाथ एवं राष्ट्रसन्त महन्त महन्त अवेद्यनाथ उन्द ढ़ संकल्पों को जाता है जहां उन्होंने राष्ट्रधर्म को ही धर्म माना। उन्होंने कहा कि भारत का विकास हिदुत्व के वैचारिक अधिष्ठान पर ही सम्भव है। आजाद भारत का पुनर्निमार्ण उसकी संास्कृतिक विरासत पर ही करना होगा तभी स्वाभिमानी, स्वावलम्बी और सम्प्रव भारत खड़ा होगा। उन्होंने कहा कि महन्त अवेद्यनाथ ने जनअभियान चलाकर महन्त दिग्विजयनाथ के वैचारिक अधिष्ठान को जनान्दोलन बना दिया गया और गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त योगी आदित्यनाथ आज उसी जनान्दोलन के प्रतिफल है। धारा 370 और 35 ए हटाकर केन्द्र की मोदी सरकार ने देश को एक करने में बड़ा काम किया है यह दोनों पूज्य महाराज के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस अवसर पर पूर्व केन्द्रीय मंत्री साध्वी उमा भारती ने कहा कि वर्तमान युग में साधु-सन्तों को मठ-मन्दिरों से बाहर निकालकर देश और समाज के लिए काम करने का मार्ग इस पीठ ने दिखाया। मोदी-योगी देश के विकास पुरूष है। ये दो व्यक्ति नहीं बल्कि राष्ट्र के वैचारिक अधिष्ठान के प्रतिकूल है। इस पीठ के पीठाधीश्वरों को जन और धन का जीतना व्यापक समर्थन मिला उतना शायद ही किसी पीठ को मिला हो लेकिन उस व्यापक जन समर्थन को इस पीठ ने राष्ट्र और समाज के हित में समर्पित कर दिया। इस पीठ के पीठाधीश्वर आध्यामिक परम्परा एंव ऊर्जा के प्रतिनिधि हैं। इस मौके भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने कहा कि स्वतंत्रता संघर्ष में आध्यात्मिक शक्ति का जागरण करने में महन्त दिग्विजयनाथ की अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रहीं है। आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का आह्वान राष्ट्रधर्म बन गया। आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के साथ इस पीठ के पीठाधीश्वरों ने कभी समझौता नहीं किया। पीठाधीश्वरों के शरीर बदले, लेकिन प्राण और आत्मा वहीं रही जिसका प्रमाण है कि महन्त अवेद्यनाथ और अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रखर राष्ट्रवाद के ध्वजवाहक बनें। सत्ता के इस षड्यंत्रों को इस पीठ ने डटकर सामना किया और भारत कि उस सन्यासी परम्परा को आगे बढ़ाया जो अपने वैचारिक अधिष्ठान के लिए ही जीती-मरती हैरी सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिस तरह से अन्तिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के लिए दिन-रात काम कर रहे है निश्चित रूप से महन्त अवेद्यनाथ द्वारा दिये गये संस्कारों का ही परिणाम है। आज पूरा उत्तर प्रदेश अपने आप को सुरक्षित महसूस कर रहा है। योगी आदित्यनाथ द्वारा किये गये कार्य दोनों ब्रह्मलीन महाराज के लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उत्तर प्रदेश के समाज कल्याण मंत्री व गोरखपुर के प्रभारी मंत्री रमापति शास्त्री ने कहा कि गोरक्षपीठ की यह श्रद्धांजलि सभा इसलिये विशिष्ट है कि संसद और विधान सभाओं में राष्ट्र और समाज से सम्बन्धित जिन महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा नहीं हो पाती वह विषय इस श्रद्धांजलि सभा में विचार किये जाते है। उन्होंने कहा कि महन्त दिग्विजयनाथ का नाम आते ही गोरखपुर का विकास दिखता है। मदन मोदन मालवीय इजीनियरिंग कालेज, गोरखपुर विश्वविद्यालय, पालीटेक्निक, महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् की सं थाएँ दिखाई देती है। हिदुत्व का मानसम्मान दिखता है। राष्ट्र पर मर-मिटने वालों की फौज खडा करने का जज्बा दिखता हैभारत-नेपाल सम्बन्धों की मिठास दिखती है और ऐसे यगपरुष को ही देश और समाज याद करता है। महाराणा प्रताप शिक्षा के अध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति प्रो० यू पी सिंह ने कहा कि शिक्षा, चिकित्सा एवं सेवा के क्षेत्र में श्री गोरक्षपीठ ने जो प्रतिमान खड़ा किया है वह पूरे देश में कहीं दिखाई नही पड़ता। अयोध्या से पधारे जगद्गुरू रामानुजाचार्य स्वामी राघवाचार्य ने कहा कि ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ हमारे प्रेरणास्रोत है। पूज्य ब्रह्मलीन दोनों महन्त नाथ सम्प्रदाय के होते हुये भी पंथ अथवा अपने सम्प्रदाय से उपर उठकर उन्होंने हिदुत्व के लिए कार्य किया और राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता की धुरी बने। पूर्वी उत्तर प्रदेश में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में दोनों महानविभूतियों का योगदान अद्धितीय है।भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उमा भारती, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह भी इस अवसर पर उपस्थित थे।