ऑडिटर्स की कोर वैल्यूज को प्रोत्‍साहित कर हम ऑक्यूपेशनल फ्रॉड पर नकेल कस पाएंगे: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी

विशाल डेटा लिंक नहीं होता जिससे नेचुरल कोर्स में एकाउंटेबिलिटी गैप जो आता है हमें उसे ब्रिज करना है।


> सीएजी को टेक्निकल टूल्स डेवलप करने होंगे ताकि संस्‍थानों में फ्रॉड के लिए कोई गुंजाइश न बचे: पी एम


> पूरे देश में संचालित किये गए हेकेथॉन से सरकार के विभागों की परेशानियों के टेक्निकल समाधान हैकथॉन के आई टी स्टूडेंट्स ने निकाले: पी एम


> बैड गवर्नेंस के चलते जहां पर चोरी होती है वहां आउटकम कम होता है: पी एम


> जिसके पास बुराइयों को रोकने की ताकत होती है, उसके पास बुराइयां होने से बचाने की भी ताकत होती है: नरेन्द्र मोदी



प्रधानमंत्री का महालेखाकारों के सम्मलेन में सम्बोधन -


श्री राजीव महर्षि, दोनों Deputy CAG, देशभर से आए सभी साथी, Friends,


अकाउंटेंट जनरल में मुझे फिर एक बार आने का मौका मिला है। ज्‍यादा तो मौका नहीं मिलता है बातचीत करने का लेकिन कुछ समय में भी कुछ अनुभव हो ही जाता है। गांधीजी की 150वीं जन्‍म-जयंती के वर्ष में ये कार्यक्रम होना, ये भी अपने-आप में सुखद है। और गांधीजी कहते थे कि जिस तरह व्‍यक्ति अपनी पीठ नहीं देख सकता, उसी तरह व्‍यक्ति के लिए अपनी त्रुटियों को देखना भी बड़ा मुश्किल होता है। लेकिन आप सभी वो दिग्‍गज हैं जो एक आईना लेकर सरकारी व्‍यवस्‍थाओं के सामने खड़े हो जाते हैं- ये कमियां हैं, ये गलतियां हैं, ये प्रोसेस ठीक नहीं है, और आप हिसाब-किताब रखने वालों का हिसाब-किताब करते हैं। लेकिन अभी जो महर्षि जी ने प्रेजेंटेशन दिखाया, उसमें मुझे खुशी है कि आपने अपना हिसाब-किताब दिखाया, ये अच्‍छी पहल है। साथियों, तीन साल पहले जो संगोष्‍ठी हुई थी, उसमें आप सभी के बीच विस्‍तार से चर्चा करने का अवसर मुझे मिला था, और उस समय चर्चा के अनेक बिंदुओं पर जैसा में देख रहा था, बहुत सी बातों को आपने पकड़ करके उसको लागू करने का काम किया और आगे भी आपकी प्रक्रिया चल रही है। और मुझे याद है कि तब मैंने कहा था, सीएजी को टुकड़ों में सोचने के बजाय सम्‍पूर्णता में काम करने की जरूरत है। सिर्फ आंकड़ों और प्रक्रियाओं तक ही ये संगठन को सीमित नहीं रह सकता है, बल्कि वाकई में गुड गवर्नेंस के एक कैटेलिस्ट के रूप में आगे आना है। सीएजी को सीएजी प्लस बनाने के सुझाव पर आप गंभीरता से अमल कर रहे हैं, ये मेरे लिए खुशी की बात है। और इसके अनेक सुखद परिणाम भी देश को मिले हैं। देश में एकाउंटेबिलिटी और प्रोबेबिलिटी का माहौल बनाने में इसके कारण एक मदद मिलती है, एक वातावरण बनता है। देश में आउटकम आधारित टाइम बांड तरीके से काम करने की जो व्‍यवस्‍था विकसित हो रही है, उसमें सीएजी की बहुत बड़ी भूमिका है। ये सब संभव तो हो पा रहा है तो इसके पीछे आप और आपके जो साथी हैं, और विशेषकर जिनको फील्ड पर काम करना होता है, फील्ड पर जा करके audit करना होता है, कहीं mining चलता है तो उसको वहां जाना पड़ता है, जाकर देखना पड़ता है। और राज्‍यों में भी जा करके महीनों-महीनों तक ऑडिटर जनरल ऑफिस के साथ ही फील्ड में डटे रहते हैं, वहां बैठे रहते हैं, एक-एक कागज को छानबीन करते रहते हैं। और कभी-कभी तो परिवार के साथ भी लंबे अर्से की दूरी हो जाती है, और तब जा करके सारी प्रोसेस निकलती है। और ऐसे ही निष्‍ठावान साथियों के कारण सीएजी की विश्‍वसनीयता बनी है और मजबूत हुई है। साथियों, दशकों से खड़ी की हुई इस व्‍यवस्‍था में बहुत तेजी से परिवर्तन लाना अपने-आप में बहुत बड़ी चुनौती होती है। क्‍योंकि शायद सरकारी व्‍यवस्‍थाओं में जिसकी सबसे ज्‍यादा उम्र है, ऐसा कोई इंस्‍टीट्यूट है तो वो सीएजी है, 1860 में स्थापित हुआ? और वो भी 1857 के बाद हुआ था तो उसकी एक हिस्‍ट्री है। कभी आप लोग गहरे जाआगे तो काफी कुछ मिलेगा उसमें से। आजकल तो रिफार्म को एक बड़ा ही फैंसी शब्द माना जाता है। हर कोई कहता है मैं भी रिफार्म करता हूं। कहीं कुछ भी करो, रिफार्म में आ जाता है। लेकिन असली रिफार्म तब आता है, जब किसी संगठन में पूरी रैंक और फाइल पूरी ईमानदारी से उसके लिए तैयार होती है, मोटीवेट होती है। और ये बात देश की हर सरकार, हर संस्‍था, हर संस्‍थान पर लागू होती है और जिसमें सीएजी भी है। सीएजी की जिम्मेदारी इसलिए भी अधिक है क्योंकि आप देश और समाज के आर्थिक आचरण को पवित्र रखने में एक अहम भूमिका निभाते हैं। और इसलिए आपसे उम्मीद भी जरा ज्‍यादा रहती है। साथियों, नीति के, अर्थशास्‍त्र और ऑडिटिंग के प्रेरणा-पुंज चाणक्‍य कहा करते थे - ज्ञाणं भारं: क्रियां विना- यानी अगर आपके पास नॉलेज है लेकिन उसको आप सही जगह पर, सही दिशा पर नहीं लगाते हैं तो वो अपने-आप में बोझ बन जाता है वो निरर्थक हो जाता है। और इसलिए आपके पास एक प्रकार से दोहरी जिम्‍मेदारी है। आपको अपने ज्ञान और अनुभव का प्रसार करना है तो साथ-साथ एथिक्स भी मजबूत बनाने हैं- और‍ जिसको चाणक्‍य ने अपने पूरे नीति शास्‍त्र के अंदर सबसे ज्‍यादा महत्‍व दिया था। और इसलिए मैं समझता हूं कि आज के डिजिटल वर्ल्ड में, बदलती टेक्‍नोलॉजी के इस दौर में ऑडिट और अश्योरेंस की भूमिका और उसमें बदलाव बहुत अहम हो चुके हैं। साथियों, टेक्‍नोलॉजी को आधार बनाकर ट्रांसपेरेंसी लाने के प्रयास आप सभी बीते पांच वर्षों से निरंतर देख रहे हैं। सरकार का हिसाब-किताब खुला और पारदर्शी रहा है, बल्कि एक डैशबोर्ड की तरह रहे हैं। जो भी है वो सबके सामने है, जितना भी है वो स्‍पष्‍ट दिखता है। टेंडर से ले करके प्रोक्योरमेंट तक एक पारदर्शी प्रक्रिया सरकार ने खड़ी की है। अब अधिकतर टेंडर ऑनलाइन होते हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्‍ट की मॉनिटरिंग भी सर्विलांस साइंटिफिक तरीके से होती है। जेएएम यानी जन-धन-आधार मोबाइल- इससे सामान्‍य मानवी तक सरकारी योजनाओं का लाभ डायरेक्ट पहुंच रहा है। और जीईएम यानी गवर्नमेंट ई मार्केटप्लेस, इससे सरकार अपनी प्रोक्योरमेंट डायरेक्ट करती है। आज सरकारी की 425 से ज्‍यादा स्‍कीम का लाभ डायरेक्ट लाभार्थियों तक पहुंच रहा है। जिसके कारण करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपये गलत हाथों में जाने से बचे हैं। विशेषतौर पर जीएसटी जैसे चुनौतीपूर्ण और जटिल सुधार को देश की व्‍यापारिक संस्‍कृति का हिस्‍सा बनाने में तो आपने भी सराहनीय भूमिका निभाई है। साथियो, आज भारत दुनिया की सबसे अग्रणी डिजिटाइज्ड इकॉनमी में से एक है और यहां तेजी से डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण हो रहा है। डिजिटल व्‍यवस्‍था ने नागरिक और सरकार के बीच के इंटरफ़ेस को, सद्भाव को, विश्‍वास को तो मजबूत किया ही है, सरकारी प्रक्रियाओं पर भी इसका सकारात्‍मक असर पड़ा है। हमारे रिकॉर्ड मेन्टेन करने के तौर-तरीके भी बदलते जाते हैं। और मैं एक उदाहरण आपको देता हूं - पहले जो सरकार को पेमेंट होती थी, उसके चालान नागरिकों को, सरकारी दफ्तरों को, ट्रेजरी को, सभी को अलग-अलग रखने पड़ते थे। लेकिन अब फिजिकल कॉपी की जरूरत नहीं है बल्कि वो एक ऐप्प में ही पेपरलेस तरीके से स्‍टोर हो जाता है। इससे जनता को तो सुविधा हुई ही है सीएजी के ऑडिट प्रोसेस में भी बहुत बड़ा बदलाव आया है। साथियों, आज जब भारत 5 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक ताकत बनने की ओर अग्रसर हो रहा है, उसमें भी आप सभी की बहुत बड़ी भूमिका है। क्योंकि आप जो करेंगे उसका सीधा असर सरकार की एफिशिएंसी पर पड़ेगा, सरकार की डिसिशन मेकिंग  और पालिसी मेकिंग पर पड़ेगा। आप जो कुछ करेंगे, उसका सीधा असर बिजनेस संस्‍थानों की एफिशिएंसी पर भी पड़ेगा, आप जो कुछ करेंगे उसका सीधा असर भारत में निवेश पर पड़ेगा, ईज़ ऑफ़ दोंग बिज़नेस पर पड़ेगा। आज जितने भी स्टेक होल्डर्स हैं, उनको सटीक ऑडिट भी चाहिए, ताकि वो अपने प्लान का सही एक्सेक्यूशन कर सकें। वहीं वो ये भी नहीं चाहते कि ऑडिट  के प्रोसेस में बहुत ज्यादा समय लगे।  यहीं से आपकी चुनौती शुरू होती है। इस चुनौती से निपटने के लिए दो काम बहुत जरूरी हैं। एक स्किल और ट्रेनिंग से जुड़ा है और दूसरा टूल्स से जुड़ा है। जो नए साथी इस प्रोफेशन से जुड़ रहे हैं, उनको तो अपडेटेड टेक्नोलॉजी से हमें लैस करना ही है, जो भी काम कर रहे हैं, इनकी स्किल को अपग्रेड करना भी उतना ही जरूरी है। अब जैसे पूरी दुनिया में जो ऑडिटिंग से जुड़ी संस्‍थाएं हैं, वे क्राउड बेस्ड सलूशन की तरफ बढ़ रही हैं। इसी तरह टेक्‍नोलॉजी को लेकर जो बेस्ट ग्लोबल प्रैक्टिसेज हैं, उनको हमें हमारे सिस्‍टम का हिस्‍सा तो बनाना ही है, इंडिया पसिफ़िक टूल्स पर भी हमें काम करना है। साथियों, हमारा लक्ष्य है कि साल 2022 तक एविडेंस बेस्ड पालिसी मेकिंग को गवर्नेंस का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए। ये न्यू इंडिया की नई पहचान बनाने में भी मदद करेगा। ऐसे में ऑडिट और अश्योरन्स के ट्रांसफॉर्मेशन के लिए भी ये सही दौर है। अब सीएजी को भी सीएजी 2.0 की तरफ बढ़ना होगा। मुझे बताया गया है कि आप इस तरफ तेजी से आगे बढ़ भी रहे हैं। ये काम हम तेजी से तभी कर पाएंगे जब कुछ गैप्स को, कुछ कड़ियों को तेजी से जोड़ पाएं। अभी हमारे यहां जो डाटा जेनेरेट हो रहा है, वो बहुत विशाल है और अनेक एजेंसियों, अनेक विभागों के पास स्‍टोर है। ये डेटा भी इन एजेंसियों और विभागों ने अपने यूज के लिए कलेक्ट किया है। लेकिन ये भी सही है कि अक्‍सर ये डेटा एक-दूसरे के साथ शेयर नहीं किया जाता। ये विशाल डेटा लिंक नहीं होता। इसलिए एकाउंटेबिलिटी गैप भी नेचुरल कोर्स में आ जाता है। हमें इसे ब्रिज करना है। और इसके लिए सरकार के स्‍तर पर भी कुछ कोशिश हो रही है, कदम उठाए जा रहे हैं। और मुझे विश्‍वास है कि आप सब भी इस विषय पर आपस में विचार करेंगे और दूसरी एजेंसियों और विभागों के साथ भी साझा करेंगे। और मुझे याद है पिछली बार मैंने आपके बीच एक ही जिले में रोड कंस्ट्रक्शन का उदाहरण दिया था। ये बताया था कि कैसे एक ही जिले में समान लंबाई की सड़क जब दो अलग-अलग डिपार्टमेंट बनाते हैं तो कई बार कीमतों में कितना फर्क रहता है। अब अलग-अलग ऑडिट के समय में तो दोनों ठीक लगते हैं, लेकिन ओवरऑल पिक्चर को देखें तो सही नहीं पाए जाते हैं। ऐसे कितने ही उदाहरण सरकारी विभागों में हैं जहां पर बिग डाटा एनालिसिस सुधार किए जा सकते हैं। और मैं समझता हूं कि जब आप बड़े डेटा बेस को अपने ऑडिट के लिए एनालाइज  करते हैं तो आपकी जानकारी एविडेंस बेस्ड पालिसी मेकिंग में बहुत काम आ सकती है। अगर इसमें सीएजी इस डेटा से जुड़ी जानकारियों के आधार पर एडवाइस दे सकें, कुछ इंस्टीटूशनल सलूशन दे सकें, तो मैं समझता हूं इससे देश की बहुत बड़ी सेवा होगी। और मेरा तो आग्रह ये भी होगा कि आप सिर्फ ऑडिट के लिहाज से ही नहीं एक थिंक टैंक के नजरिए से भी सोचें।



साथियों, मैंने पिछली बार इंस्टीटूशनल मेमोरी की भी बात की थी। डिजिटल ऑडिट और डिजिटल गवर्नेंस, अलग-अलग संस्‍थाओं में इस इंस्टीटूशनल मेमोरी को भी मजबूत करने का काम कर सकती है। एक और काम आप आसानी से कर सकते हैं, सीएजी अनेक अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं का ऑडिट करती है, दूसरे देशों को ऑडिट में टेक्निकल सपोर्ट देती है। आप एक ऐसा इंस्टीटूशनल मैकेनिज्म तैयार कर सकते हैं जिसमें इंटरनेशनल ऑडिट करने वाली टीमें अपने अनुभव साझा कर सकें, वहां की बेस्ट प्रैक्टिसेज को शेयर कर सकें, सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट ज्‍यादा सार्थक हो। इसके लिए क्‍या हम ऑडिट के टॉपिक को विचार-विमर्श करने के लिए चुन सकते हैं क्‍या? इस पर हमें जरूर विचार करना चाहिए। आप अनेक प्रकार के ऑडिट करके आ रहे हैं। मेरा एक सुझाव है कि आप प्रोसेस ऑडिट पर भी गौर करें। अभी तक तो आप सिर्फ यही देखते हैं कि प्रोसेस फॉलो  हुआ या नहीं हुआ। लेकिन क्‍या उस प्रोसेस पर कोई सुधार संभव है, ताकि निर्धारित लक्ष्‍य तक पहुंचा जा सके? ये सुझाव आएगा और मैं समझता हूं कि बहुत मददकारक होगा। एक और शिकायत विभागों की तरफ से रहती है कि सीएजी ऑडिट बहुत जल्‍दी-जल्‍दी होता है, जिसके कारण जो फाइंडिंग्स निकलती हैं, वो उतनी काम नहीं आ पाती हैं। क्‍या ऐसा संभव है कि विभागों के इंटरनल ऑडिट, उसमें कैसे मजबूती आए, और वो इन ट्यून विथ सीएजी कैसे हो, ताकि हम समय भी बचा सकें और एफिशिएंसी बढ़ा सकें। और इससे होगा ये कि रूटीन ऑडिट विभाग खुद जब करते हैं तो इन सारी बारी‍कियों को ध्‍यान दें ताकि जब सीएजी वहां जाएं तो उसको जो रेडीमेड मटेरियल मिले, उसमें बहुत कम चीजों की जरूरत पड़ेगी और हम एफिशिएंसी  बढ़ा सकते हैं, हम स्पीड भी बढ़ा सकते हैं। साथियों, ये चुनौती उस टेक्‍नोलॉजी से हमें निपटने की है जो गलत काम करने वालों के पास है। अब सीएजी सहित तमाम ऑडिटर्स को चाहे वो इंटरनल हो, या फिर एक्सटर्नल हो, नई चुनौतियों से निपटने के लिए इनोवेटिव तरीके ढूंढने ही पड़ेंगे। और इसके लिए सबसे पहले हमें ऑडिटर्स की कोर वैल्यूज को प्रोत्‍साहित करना होगा, तभी हम ऑक्यूपेशनल फ्रॉड पर नकेल कस पाएंगे। बीते कुछ सालों में सरकारी विभागों में फ्रॉड से निपटने के लिए अनेक प्रयास हुए हैं। अब सीएजी को ऐसे टेक्निकल टूल्स डेवलप करने होंगे ताकि संस्‍थानों में फ्रॉड के लिए कोई गुंजाइश न बचे। और मैं आपको सुझाव देना चाहता हूं- मैंने पिछले दिनों इसका प्रयोग किया है, क्‍या सीएजी इस पर सोच सकता है क्‍या? मैंने भारत सरकार के अलग-अलग डिपार्टमेंटों से प्रार्थना की कि आपके पास ऐसी कौन सी प्रॉब्लम है, कि जिसके सलूशन में या उन समस्‍याओं के समाधान में या डिलीवरी में आपको दिक्‍कतें होती हैं? शुरू में तो डिपार्टमेंट के लिए ऐसा स्‍वीकार करना मुश्किल होता है, तो सबका पहला रिपोर्ट यही आता है, नहीं हमारे यहां कोई तकलीफ नहीं है, सब बहुत अच्‍छा है, कोई तकलीफ नहीं है, बहुत बढ़िया चल रहा है। मैं जरा पीछे लगा रहा, बार-बार पूछता रहा, तो अलग-अलग डिपार्टमेंट्स से करीब-करीब 400 इश्यूज आए। उनको लगता था कि इसका टचोलोजिकल सलूशन हो तो अच्‍छा हो। इन 400 इश्यूज को मैंने अलग-अलग यूनिवर्सिटीज के आईटी बेस्ड काम करने वाले स्टूडेंट्स को दिया और पूरे देश में हेकेथॉन चलाया। लाखों नौजवानों ने उसमें हिस्‍सा लिया। मिनिमम 36 घंटे नॉन-स्टॉप इन टोलियों ने काम किया। उसमें से निकलते-निकलते-निकलते ऊपर जब करीब 10-12 हजार बच्‍चे बचे तो मैंने खुद ने उनसे चर्चा की। और आप हैरान हो जाएंगे इन 400 जो इश्यूज निकाले थे, अधिकतर का सॉल्‍यूशन इन 18-20-22 साल के बच्‍चों ने निकाल करके दिया, टेक्नॉलजी बेस्ड सलूशन और सरकार का भी मैं अभिनंदन करूंगा कि उसमें से करीब-करीब 80 पर्सेंट उन्‍होंने आलरेडी अपनी व्‍यवस्‍था में इनकॉरपोरेट कर दिया, लागू कर दिया। क्‍या सीएजी आज जो चुनौतियां हैं, जैसे अब आपने प्रेजेंटेशन में बताया कि ये हॉस्पिटल का ऑडिट करना इन्‍हें कितना बड़ा टेक्‍नीकल काम है, कैसे करना है। अब आप तो उस फील्‍ड के हैं नहीं। कोई एक डॉक्‍टर मिल जाए, वो आपको कहे तो आप उस दिशा में जा करके देख लेंगे। क्‍या हम इस प्रकार की चीजों के लिए आइडेंटिफाई करके इतने-इतने इश्यूज हैं, टेक्निकल सोलूशन्स निकाले जा सकते हैं। तो आप अगर इस प्रकार से इश्यूज इन नौजवानों को दें और मैं एचआरडी मिनिस्‍ट्री को कह सकता हूं कि भई इसके साथ कोआर्डिनेट करें। और इस प्रकार के हेकेथॉन हों जो सीएजी के लिए ऐसे टूल बनाएं, सीएजी के लिए इस प्रकार के सॉल्‍यूशंस ले करके आएं। आपके कुछ लोगों को उनके साथ विचार-विमर्श करने का मौका मिले तो मैं समझता हूं एक अच्‍छा मैकेनिज्म और ये इयरली किया जा सकता है। ये हेकेथॉन, इससे ये भी लाभ होगा कि हमारे देश की युवा पीढ़ी है उसको भी पता चलेगा कि हिंदुस्‍तान की शासन व्‍यवस्‍था की सबसे वृद्ध, अनुभवी ये इंस्टीटूशन कैसे-कैसे काम कर रही है और कितनी चुनौतियों को ले करके चलती है। मैं समझता हूं कि इस काम की ओर सोचा जा सकता है और देखना चाहिए। और ऐसे प्रयासों से देश के सामान्‍य मानवी की परेशानी कम होगी और देश की तमाम संस्‍थाओं पर उसका भरोसा भी मजबूत होगा। एट द सेम टाइम गवर्नमेंट इश्यूज जो है, उसका और आपका भी- इन दोनों मे तारतम्‍य बनेगा। मुझे विश्‍वास है कि सीएजी देश की तमाम अपेक्षाओं पर खरा उतरेगी और न्‍यू इंडिया को क्लीन इंडिया, क्लीन इंडिया - वो वाला नहीं जो मैं करता हूं, आप वाला दूसरा है- बनाने में अपनी भूमिका को सशक्‍त करेगी। और मेरा आपसे आग्रह है- एक तो होता है हम ऑडिट करें। लेकिन क्‍या ऑडिट किसी को कटघरे में खड़ा करने के लिए तो ठीक है, लेकिन क्‍या हम वहीं पर रुकने के लिए हैं क्‍या? जी नहीं, हम कहीं पर भी हों, किसी भी अम्‍ब्रेला के नीचे काम करते हों, लेकिन अंततः हम सब देश के लिए काम करते हैं, देश के उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिए काम करते हैं, हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए काम करते हैं। और इसलिए हम ये जो मेहनत करते हैं, क्‍या वो गुड गवर्नेंस के लिए काम आ सकती है क्‍या? एफिशिएंसी के लिए काम आ सकती है क्‍या?  और ये किया जा सकता है- जैसे हर बार जरूरी नहीं है कि जो है उसमें से हम कमियां खोजें। लेकिन अगर साल के प्रारंभ में ही आप दस डिपार्टमेंट पकड़ लें। दस डिपार्टमेंट के संबंध में ब्रेन स्टॉर्मिंग हो, डिपार्टमेंट के साथ, आपके लोगों के साथ, जिस-किस में महारत है, ग्रास रुट लेवल पर भी कोई काम करने वाला हो, वो भी हो, डिस्ट्रिक्‍ट लेवल पर काम करने वाला हो, स्‍टेट लेवल पर करने वाला हो, नेशनल लेवल पर हो। ब्रेन स्टॉर्मिंग करके मान लीजिए एक डायरेक्ट आप 100 point निकालते हैं, और उनको कहा जाए कि देखिए भाई हम एक साल के बाद ऑडिट के लिए आएंगे। ये हम सबने मिलकर जो 100 point निकाले हैं, आप अपने काम का इस 100 point के तराजू पर जरा तौलिए। आप जो चीजें रिकॉर्ड रखेंगे, इन 100 पहलुओं को उसमें जरूर ध्‍यान रखिए। इसका मतलब ये हुआ कि जो ऑडिट माइंड है वो पहले से उसको इंगित करेगा कि देखिए आपको गलती न हो, इसके के लिए मैं आपको प्रोफार्मा देता हूं। आप देखिए, इससे फर्क ये पड़ेगा एफिशिएंसी बढ़ेगी, गवर्नेंस के पहलू में नई बातें उजागर होंगी, जो सरकार की अपने-आप में एक स्ट्रेंथ बन जाएगी। और इसलिए मैं चाहूंगा कि हम ऐसे भी कुछ प्रयास कर सकते हैं क्‍या? दूसरा आपने देखा होगा, हम बजट में, हाउस में हम आउटकम रिपोर्ट भी रखते हैं, जो पहले हमारे यहां नहीं था। क्‍योंकि output की चर्चा तो बड़ी सरल होती है, कि दस रुपया था, दस रुपया दे दिया। क्‍या किया, क्‍यों‍ किया, कैसे किया, किसके लिए किया, कब किया, करना चाहिए था, नहीं करना चाहिए था, सारी बातें- वो आपके क्षेत्र में चला जाता है। और वो आउटकम शुरू होता है। और इसलिए हाऊस के अंदर  इन दिनों आउटकम की व्‍यवस्‍था हमने डेवलप की है और ये इंस्टीटूशनलाइज़्ड की है। लेकिन कभी-कभी प्रोसेस बढ़िया, प्रॉडक्‍ट बढ़िया, आउटकम क्‍या? आउटकम कहां कम होता है, जहां पर चोरी होती है वहां आउटकम कम होता है बात अलग है, ज्‍यादातर बैड गवर्नेंस  उसके लिए जिम्‍मेदार होता है। अगर गर्वनेंस सही है तो नेचुरल कोर्स में आउटकम और एफिशिएंसी नजर आती है। और इसलिए हम अपनी बातों को गुड गवर्नेंस का भी एक हिस्‍सा बना सकते हैं। और इसलिए मैं कहूंगा क्या टारगेट था, क्या अचीव किया गया, और इसको लेकर आपका दृष्टिकोण बारीक होते हुए भी मैं जरूर चाहूंगा कि हम एडवांस में अपने-अपने संस्‍थानों को मजबूत बनाने के लिए कैसे आगे बढ़ सकते हैं- हम प्रयास करें। मैं फिर एक बार- आज आपके बीच आने का मुझे मौका मिला है। आप सबको देश की एक उत्‍तम सेवा करने के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। 2022 में आजादी के 75 साल होंगे। क्‍या  सीएजी 2022 आजादी के 75 साल एक इंस्टीटूशन के तौर पर हमारे टारगेट क्‍या होंगे? हम इस इंस्टीटूशन को और अधिक फ्रेंडली कैसे बनाएंगे? प्रोडक्टिव कैसे बनाएंगे? गुड गवर्नेंस में कंट्रीब्यूटर कैसे बनाएंगे? हमारे इस अनुभव का उपयोग बुराइयां ढूंढने की जिसकी ताकत है, उसकी बुराइयो को रोकने की भी ताकत होती है। जिसकी  बुराइयो को रोकने की भी ताकत होती है, जिसको बुराइयां होने से बचाने की भी ताकत होती है, क्‍या हम इन्‍हीं सभी पहलूओं के साथ जुड़ करके इस सारी इतनी बड़ी इंस्टीटूशन का हम और अधिक प्रभावी उपयोग कर सकते हैं? और मैं मानता हूं कि संभव है। आपको लगेगा कि फाइलें देख-देख करके तंग आ जाते हैं और ये प्रधानमंत्री चार काम नए दे करके जा रहा है, लेकिन मैं मानता हूं कि फिर आपका जो ये बोझ है, वो अपने-आप कम हो जाएगा और आपको भी संतोष होगा कि आपने जो और कंट्रीब्यूट  किया है, वो इंस्टीटूशनलाइज़्ड हुआ है जिस तरह देश के नक्‍शे को जो एक सोच है उसको बदलने में बहुत बड़ा रोल प्‍ले किया है, और ये हो सकता है। इसी अपेक्षाओं के साथ मेरी आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बहुत-बहुत धन्‍यवाद।



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सीएजी परिसर में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की प्रतिमा का अनावरण किया गया।