'मन की बात 2.0' की तीसरी कड़ी में प्रधानमंत्री के सम्बोधन का मूल पाठ


> इस बार वेनिस बिएन्नाले के इंडिया पवेलियन में गाँधी जी की यादों से जुड़ी बहुत ही दिलचस्प प्रदर्शनी लगायी गयी।


> स्वच्छता ही सेवा' अभियान 11 सितम्बर से शुरू होगा। इस दौरान हम अपने-अपने घरों से बाहर निकल कर श्रमदान के ज़रिये महात्मा गाँधी को कार्यांजलि दें।


> जब सारा प्लास्टिक वेस्ट इकठ्ठा हो जाए तो इसके उचित निस्तारण हेतु आगे आयें, डिस्पोजल की व्यवस्था करें कॉर्पोरेट सेक्टर


> सितम्बर महीना पोषण अभियान के रूप में मनाया जाएगा। आप जरुर इससे जुड़िये, जानकारी लीजिये, कुछ नया जोड़ियें


> भारत में सिर्फ बाघों की संख्या ही नहीं बल्कि प्रोटेक्टेड एरियाज और कम्युनिटी रेज़र्वस की संख्या भी बढ़ी।


मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार। हमारा देश, इन दिनों एक तरफ वर्षा का आनंद ले रहा है, तो दूसरी तरफ, हिंदुस्तान के हर कोने में किसी ना किसी प्रकार से, उत्सव और मेले, दीवाली तक, सब-कुछ यही चलता है और शायद हमारे पूर्वजों ने, ऋतु चक्र, अर्थ चक्र और समाज जीवन की व्यवस्था को बखूबी इस प्रकार से ढाला है कि किसी भी परिस्थिति में, समाज में, कभी भी मंदता ना आये। पिछले दिनों हम लोगों ने कई उत्सव मनायेकल, हिन्दुस्तान भर में श्री कृष्ण जन्ममहोत्सव मनाया गया। कोई कल्पना कर सकता है कि कैसा व्यक्तित्व होगा, कि, आज हजारों साल के बाद भी, हर उत्सव, नयापन लेकर के आता है, नयी प्रेरणा लेकर के आता है, नयी ऊर्जा लेकर के आता है और हजारों साल पुराना जीवन ऐसा, कि जो आज भी समस्याओं के समाधान के लिए, उदाहरण दे सकता हो, प्रेरणा दे सकता हो, हर कोई व्यक्ति, श्री कृष्ण के जीवन में से, वर्तमान की समस्याओं का समाधान ढूंढ सकता है। इतना सामर्थ्य होने बावजूद भी कभी वो रास में रम जाते थे, तो कभी, गायों के बीच तो कभी ग्वालों के बीच, कभी खेल-कूद करना, तो कभी बांसुरी बजाना, ना जाने विविधताओं से भरा ये व्यक्तित्व, अप्रतिम सामर्थ्य का धनी, लेकिन, समाज-शक्ति को समर्पित, लोक-शक्ति को समर्पित, लोक-संग्राहक के रूप में, नये कीर्तिमान को स्थापित करने वाला व्यक्तित्व। मित्रता कैसी हो, तो, सुदामा वाली घटना कौन भूल सकता है और युद्ध भूमि में, इतनी सारी महानताओं के बावजूद भी, सारथी का काम स्वीकार कर लेनाकभी चट्टान उठाने का, कभी, भोजन के पत्तल उठाने का काम, यानी हर चीज में एक नयापन सा महसूस होता है और इसलिए, आज जब, मैं, आपसे बात कर रहा हूँ, तो, मैं, दो मोहन की तरफ, मेरा ध्यान जाता हैएक सुदर्शन चक्रधारी मोहन, तो दूसरे चरखाधारी मोहन। सुदर्शन चक्रधारी मोहन यमुना के तट को छोड़कर के, गुजरात में समुन्द्र के तट पर जा करके, द्वारिका की नगरी में स्थिर हुए और समुन्द्र के तट पर पैदा हुए मोहन, यमुना के तट पर आकर के, दिल्ली में, जीवन के, आखिरी सांस लेते हैं। सुदर्शन चक्रधारी मोहन ने उस समय की स्थितियों में, हजारों साल पहले भी, युद्ध को टालने के लिए, संघर्ष को टालने के लिए, अपनी बुद्धि का, अपने कर्तव्य का, अपने सामर्थ्य का, अपने चिंतन का भरसक उपयोग किया था और चरखाधारी मोहन ने भी तो एक ऐसा रास्ता चुना, स्वतंत्रता के लिए, मानवीय मूल्यों के जतन के लिए, व्यक्तित्व के मूल तत्वों को सामर्थ्य दे - इसके लिए आजादी के जंग को एक ऐसा रूप दिया, ऐसा मोड़ दिया जो पूरे विश्व के लिए अजूबा है, आज भी अजूबा है। निस्वार्थ सेवा का महत्व हो, ज्ञान का महत्व हो या फिर जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव के बीच मुस्कुराते हुए आगे बढ़ने का महत्व हो, ये हम, भगवान कृष्ण के सन्देश से सीख सकते हैं और इसीलिये तो श्रीकृष्ण, जगतगुरु के रूप में भी जाने गए हैं – “कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम”आज जब हम, उत्सवों की चर्चा कर रहे हैं, तब, भारत एक और बड़े उत्सव की तैयारी में जुटा है और भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में भी उसकी चर्चा है। मेरे प्यारे देशवासियो, मैं बात कर रहा हूँ महात्मा गाँधी की 150वीं जयन्ती। 2 अक्टूबर, 1869, पोरबन्दर, समुद्र के तट पर, जिसे आज हम कीर्ति मंदिर कहते हैं,उस छोटे से घर में एक व्यक्ति नहीं, एक युग का जन्म हुआ था, जिसने, मानव इतिहास को नया मोड़ दिया, नये कीर्तिमान स्थापित करवा दिए। महात्मा गाँधी से एक बात हमेशा जुड़ी रही, एक प्रकार से उनके जीवन का वो हिस्सा बनी रही और वह थी - सेवा, सेवा-भाव, सेवा के प्रति कर्तव्य-परायणता । उनका पूरा जीवन देखें, तो, South Africa में उन समुदायों के लोगों की सेवा की जो नस्लीय भेद-भाव का सामना कर रहे थे। उस युग में, वो बात छोटी नहीं थी जी। उन्होंने उन किसानों की सेवा की जिनके साथ चम्पारण में भेद-भाव किया जा रहा था, उन्होंने उन मिल मजदूरों की सेवा की जिन्हें उचित मजदूरी नहीं दी जा रही थी, उन्होंने, ग़रीब, बेसहारा, कमजोर और भूखे लोगों की सेवा को, अपने जीवन का परम कर्तव्य माना। रक्त-पित्त के सम्बन्ध में कितनी भ्रमणाएँ थी, उन भ्रमणाओं को नष्ट करने के लिये स्वयं रक्त-पित्त से ग्रस्त लोगों की सेवा खुद करते थे और स्वयं के, जीवन में, सेवा के माध्यम से, उदाहरण प्रस्तुत करते थे। सेवा, उन्होंने शब्दों में नहीं - जी करके सिखायी थीसत्य के साथ, गांधी का जितना अटूट नाता रहा है, सेवा के साथ भी गाँधी का उतना ही अनन्य अटूट नाता रहा है। जिस किसी को, जब भी, जहाँ भी जरुरत पड़ी, महात्मा गाँधी सेवा के लिए हमेशा उपस्थित रहे। उन्होंने ना केवल सेवा पर बल दिया बल्कि उसके साथ जुड़े आत्म-सुख पर भी जोर दिया। सेवा शब्द की सार्थकता इसी अर्थ में है कि उसे आनंद के साथ किया जाए - सेवा परमो धर्मः। लेकिन, साथ-साथ उत्कृष्ट आनंद, 'स्वान्तः सुखायः' इस भाव की अनुभूति भी' सेवा में, अन्तर्निहित है। ये, बापू के जीवन से हम भली-भांति समझ सकते हैं। महात्मा गाँधी, अनगिनत भारतीयों की तो आवाज बने ही, लेकिन, मानव मूल्य और मानव गरिमा के लिए, एक प्रकार से, वे, विश्व की आवाज बन गये थे। महात्मा गाँधी के लिए, व्यक्ति और समाज, मानव और मानवता, यही सब कुछ था। चाहे, अफ्रीका में फीनिक्स फार्म हो, या टॉलस्टॉय फार्म, साबरमती आश्रम हो या वर्धा सब स्थानों पर, अपने एक अनोखे अंदाज में, समाज संवर्धन कम्युनिटी मोबिलाइजेशन पर उनका हमेशा बल रहा। ये मेरा बहुत ही सौभाग्य रहा है, कि, मुझे, पूज्य महात्मा गाँधी से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जगहों पर जाकर के नमन करने का अवसर मिला है। मैं कह सकता हूँ कि गाँधी, सेवा-भाव से संगठन-भाव को भी बल देते रहते थेसमाज-सेवा और समाज-संवर्धन कम्युनिटी सर्विस और कम्युनिटी मोबिलाइजेशन यह वो भावना जिसे हमें अपने व्यवाहारिक जीवन में लाना है। सही अर्थों में, यही महात्मा गाँधी को सच्ची श्रद्धांजलि है, सच्ची कार्यांजलि है। इस प्रकार के अवसर तो बहत आते हैं, हम जुड़ते भी हैं, लेकिन क्या गाँधी 150 ? ऐसे ही आकर के चला जाये, हमें मंजूर है क्या? जी नहीं देशवासियो। हम सब, अपने आप से पूछे, चिंतन करें, मंथन करें, सामूहिक रूप से बातचीत करें। हम समाज के और लोगों के साथ मिलकर के, सभी वर्गों के साथ मिलकर के, सभी आयु के लोगों के साथ मिलकर के — गाँव हो, शहर हो, पुरुष हो, स्त्री हो, सब के साथ मिलकर के, समाज के लिये, क्या करें – एक व्यक्ति के नाते, मैं उन प्रयासों में क्या जोडूं। मेरी तरफ से वैल्यू एडिशन क्या हो? और सामूहिकता की अपनी एक ताकत होती है। इस पूरे, गाँधी 150, के कार्यक्रमों में, सामूहिकता भी हो, और सेवा भी हो। क्यों ना हम मिलकर के पूरा मोहल्ला निकल पड़े। अगर हमारी फुटबाल की टीम है, तो फुटबाल की टीम, फुटबाल तो खेलेंगे ही लेकिन एक-आध गाँधी के आदर्शों के अनुरूप सेवा का काम भी करेंगे। हमारी लेडीज़ क्लब है। आधुनिक युग के लेडीज़ क्लब के जो काम होते हैं वो करते रहेंगे, लेकिन, लेडीज़ क्लब की सभी सखियाँ मिलकर के कोई ना कोई एक सेवा कार्य साथ मिलकर के करेंगे। बहत कुछ कर सकते हैं। किताबें इकट्ठी करें पुरानी, ग़रीबों को बांटें, ज्ञान का प्रसार करें, और मैं मानता हूँ शायद 130 करोड़ देशवासियों के पास, 130 करोड़ कल्पनायें हैं, 130 करोड़ उपक्रम हो सकते हैं। कोई सीमा नहीं है - जो मन में आये - बस सदइच्छा हो, सदहेतु हो, सदभाव हो और पूर्ण समर्पण भाव की सेवा हो और वो भी स्वांत: सुखाय: - एक अनन्य आनंद की अनुभूति के लिये होमेरे प्यारे देशवासियो, कुछ महीने पहले, मैं, गुजरात में दांडी गया था। आजादी के आंदोलन में नमक सत्याग्रह', दांडी, एक बहुत ही बड़ा महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट है। दांडी में, मैंने, महात्मा गाँधी को समर्पित अति-आधुनिक एक संग्रहालय का उद्घाटन किया था। मेरा, आपसे जरूर आग्रह है, कि, आप भी, आने वाले समय में महात्मा गाँधी से जुड़ी कोई न कोई एक जगह की यात्रा जरूर करें। यह, कोई भी स्थान हो सकता है - जैसे पोरबंदर हो, साबरमती आश्रम हो, चंपारण हो, वर्धा का आश्रम हो और दिल्ली में महात्मा गाँधी से जुड़े हुए स्थान हो, आप जब, ऐसी जगहों पर जाएँ, तो, अपनी तस्वीरों को सोशल मीडिया पर साझा जरुर करें, ताकि, अन्य लोग भी उससे प्रेरित हों और उसके साथ अपनी भावनाओं को व्यक्त करने वाले दो-चार वाक्य भी लिखिएआपके मन के भीतर से उठे हए भाव, किसी भी बडी साहित्य रचना से, ज्यादा ताक़तवर होंगे और हो सकता है, आज के समय में, आपकी नज़र में, आपकी कलम से लिखे हुए गाँधी का रूप, शायद ये अधिक प्रासंगिक भी लगे। आने वाले समय में बहुत सारे कार्यक्रमों, प्रतियोगिताओं, प्रदर्शनियों की योजना भी बनाई गई है। लेकिन इस संदर्भ में एक बात बहुत रोचक है जो मैं आपसे साझा करना चाहता हूँवेनिस बिएन्नाले नाम का एक बहुत प्रसिद्ध आर्ट शो है। जहाँ दुनिया भर के कलाकार जुटते है। इस बार वेनिस बिएन्नाले के इंडिया पवेलियन में गाँधी जी की यादों से जुड़ी बहुत ही दिलचस्प प्रदर्शनी लगाई गई। इसमें हरिपुरा पैनल विशेष रूप से दिलचस्प थे। आपको याद होगा कि गुजरात के हरीपुरा में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था जहाँ पर सुभाष चन्द्र बोस के अध्यक्ष चुनने की घटना इतिहास में दर्ज है। इन आर्ट पैनल्स का एक बहुत ही खूबसूरत अतीत है। कांग्रेस के हरिपुरा सत्र से पहले 1937-38 में महात्मा गाँधी ने शांति निकेतन कला भवन के तत्कालीन प्राचार्य नन्द लाल बोस को आमन्त्रित किया था। गाँधी जी चाहते थे कि वे भारत में रहने वाले लोगों की जीवनशैली को कला के माध्यम से दिखाए और उनकी इस आर्ट वर्क का प्रदर्शन अधिवेशन के दौरान होये वही नन्द लाल बोस है जिनका आर्ट वर्क हमारे संविधान की शोभा बढ़ाता है। संविधान को एक नई पहचान देता है। और उनकी इस कला साधना ने संविधान के साथ-साथ नन्द लाल बोस को भी अमर बना दिया है। नन्द लाल बोस ने हरिपुरा के आस-पास के गाँव का दौरा किया और अंत में ग्रामीण भारत के जीवन को दर्शाते हुए कुछ आर्ट कैनवास बनाये। इस अनमोल कलाकारी की वेनिस में जबरदस्त चर्चा हुई। एक बार फिर गाँधी जी की 150वीं जन्म जयंती पर शुभकामनाओं के साथ, हर हिन्दुस्तानी से कोई न कोई संकल्प की, मैं अपेक्षा करता हूँ। देश के लिए, समाज के लिए, किसी और के लिए कुछ न कुछ करना चाहिएयही बापू को अच्छी, सच्ची, प्रमाणिक कार्यांजलि होगी। माँ भारती के सपूतों, आपको याद होगा कि पिछले कुछ सालों में हम 2 अक्टूबर से पहले लगभग 2 सप्ताह तक देशभर में स्वच्छता ही सेवा' अभियान चलाते है। इस बार ये 11 सितम्बर से शुरू होगा। इस दौरान हम अपने-अपने घरों से बाहर निकल कर श्रमदान के ज़रिये महात्मा गाँधी को कार्यांजलि देंगे। घर हो या गलियाँ, चौक-चौराहे हो या नालियाँ, स्कूल, कॉलेज से लेकर सभी सार्वजनिक स्थलों पर स्वच्छता का महा अभियान चलाना है। इस बार प्लास्टिक पर विशेष जोर देना है 15 अगस्त को लाल किले से मैंने ये कहा कि जिस उत्साह व ऊर्जा के साथ सवा-सौ करोड़ देशवासियों ने स्वच्छता के लिए अभियान चलाया। खुले में शौच से मुक्ति के लिए कार्य किया। उसी प्रकार हमें साथ मिलकर सिंगल यूज़ प्लास्टिक के इस्तमाल को खत्म करना है। इस मुहीम को लेकर समाज के सभी वर्गों में उत्साह है। मेरे कई व्यापारी भाइयों-बहनों ने दुकान में एक तख्ती लगा दी है, एक पोस्टर लगा दिया है। जिस पर यह लिखा है कि ग्राहक अपना थैला साथ ले करके ही आये। इससे पैसा भी बचेगा और पर्यावरण की रक्षा में वे अपना योगदान भी दे पायेंगेइस बार 2 अक्टूबर को जब बापू की 150वीं जयंती मनायेंगे तो इस अवसर पर हम उन्हें न केवल खुले में शौच से मुक्त भारत समर्पित करेंगे बल्कि उस दिन पूरे देश में प्लास्टिक के खिलाफ एक नए जन-आंदोलन की नींव रखेंगे। मैं समाज के सभी वर्गों से, हर गाँव, कस्बे में और शहर के निवासियों से अपील करता हूँ, करबद्ध प्रार्थना करता हूँ कि इस वर्ष गाँधी जयंती, एक प्रकार से हमारी इस भारत माता को प्लास्टिक कचरे से मुक्ति के रूप में हम मनाये। 2 अक्टूबर विशेष दिवस के रूप में मनायें। महात्मा गाँधी जयंती का दिन एक विशेष श्रमदान का उत्सव बन जाए। देश की सभी नगरपालिका, नगरनिगम, जिला-प्रशासन, ग्राम-पंचायत, सरकारी-गैर सरकारी सभी व्यवस्थाएँ, सभी संगठन, एक-एक नागरिक हर किसी से मेरा अनुरोध है कि प्लास्टिक कचरे के कलेक्शन और स्टोरेज के लिए उचित व्यवस्था हो। मैं कॉर्पोरेट सेक्टर से भी अपील करता हूँ कि जब ये सारा प्लास्टिक वेस्ट इकठ्ठा हो जाए तो इसके उचित निस्तारण हेतु आगे आयें, डिस्पोजल की व्यवस्था हो। इसे रीसायकल किया जा सकता है। इसे ईंधन बनाया जा सकता है। इस प्रकार इस दिवाली तक हम इस प्लास्टिक कचरे के सुरक्षित निपटारे का भी कार्य पूरा कर सकते है। बस संकल्प चाहिए। प्रेरणा के लिए इधर-उधर देखने की जरुरत नहीं है गाँधी से बड़ी प्रेरणा क्या हो सकती है। मेरे प्यारे देशवासियों, हमारे संस्कृत सुभाषित एक प्रकार से ज्ञान के रत्न होते हैं। हमें जीवन में जो चाहिए वो उसमे से मिल सकता है। इन दिनों तो मेरा संपर्क बहुत कम हो गया है लेकिन पहले मेरा संपर्क बहुत थाआज मैं एक संस्कृत सुभाषित से एक बहुत महत्वपूर्ण बात को स्पर्श करना चाहता हूँ और ये सदियों पहले लिखी गई बातें हैं, लेकिन आज भी, इसका कितना महत्व है। एक उत्तम सुभाषित है और उस सुभाषित ने कहा है -


“पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।


मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा प्रदीयते |"


यानि कि पृथ्वी में जल, अन्न और सुभाषित – यह तीन रत्न है। मूर्ख लोग पत्थर को रत्न कहते हैंहमारी संस्कृति में अन्न की बहुत अधिक महिमा रही है। यहाँ तक कि हमने अन्न के ज्ञान को भी विज्ञान में बदल दिया है। संतुलित और पोषक भोजन हम सभी के लिए जरुरी है। विशेष रूप से महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए, क्योंकि, ये ही हमारे समाज के भविष्य की नींव है।पोषण अभियान के अंतर्गत पूरे देशभर में आधुनिक वैज्ञानिक तरीकों से पोषण को जनआन्दोलन बनाया जा रहा है। लोग नए और दिलचस्प तरीकों से कुपोषण से लड़ाई लड़ रहे हैं। कभी मेरे ध्यान में एक बात लाई गई थी। नाशिक के अन्दर 'मुट्ठी भर धान्य' एक बड़ा आन्दोलन हो गया है। इसमें फसल कटाई के दिनों में आंगनवाड़ी सेविकाएँ लोगों से एक मुट्ठी अनाज इकठ्ठा करती हैंइस अनाज का उपयोग, बच्चों और महिलाओं के लिए गर्म भोजन बनाने में किया जाता है। इसमें दान करने वाला व्यक्ति एक प्रकार से जागरुक नागरिक समाज सेवक बन जाता है। इसके बाद वो इस ध्येय के लिए खुद भी समर्पित हो जाता है। उस आन्दोलन का वो एक सिपाही बन जाता है। हम सभी ने परिवारों में हिंदुस्तान के हर कोने में अन्न प्राशन संस्कार के बारे में सुना है। ये संस्कार तब किया जाता है जब बच्चे को पहली बार ठोस आहार खिलाना शुरू करते हैं। लिक्विड फूड नही सॉलिड फूड गुजरात ने 2010 में सोचा कि क्यूँ न 'अन्न प्राशन संस्कार' के अवसर पर बच्चों को मानार्थ भोजन दिया जाये ताकि लोगों को, इसके बारे में जागरुक किया जा सके। यह एक बहुत ही शानदार पहल है जिसे, हर कहीं, अपनाया जा सकता है। कई राज्यों में लोग तिथि भोजन अभियान चलाते हैं। अगर परिवार में जन्मदिन हो, कोई शुभदिन हो, कोई स्मृति दिवस हो, तो परिवार के लोग, पौष्टिक खाना, स्वादिष्ट खाना बनाकर के आंगनवाड़ी में जाते हैं, स्कूलों में जाते हैं और परिवार के लोग खुद बच्चों को परोसते हैं, खिलाते हैंअपने आनंद को भी बाँटते हैं और आनंद में इज़ाफा करते हैं। सेवाभाव और आनंदभाव का अद्भुत मिलन नज़र आता है। साथियों, ऐसी कई सारी छोटी-छोटी चीजें हैं जिससे हमारा देश कुपोषण के खिलाफ़ एक प्रभावी लड़ाई लड़ सकते हैं। आज, जागरूकता के आभाव में, कुपोषण से ग़रीब भी, और संपन्न भी, दोनों ही तरह के परिवार प्रभावित हैं। पूरे देश में सितम्बर महीना पोषण अभियान' के रूप में मनाया जाएगा। आप जरुर इससे जुड़िये, जानकारी लीजिये, कुछ नया जोड़ियें। आप भी योगदान दीजिये। अगर आप एकाध व्यक्ति को भी कुपोषण से बाहर लाते हैं मतलब हम देश को कुपोषण से बाहर लाते हैं। “हेलो सर, मेरा नाम सृष्टि विद्या है और मैं सेकंड ईयर की छात्रा हूँ। सर मैंने 12 अगस्त को आपका एपिसोड देखा था बेयर ग्रिल्स के साथ, जिसमें आप आये थे। तो सर मुझे वो आपका एपिसोड देखकर बहुत अच्छा लगा। सबसे पहले तो ये सुनकर अच्छा लगा कि आपको हमारे प्रकृति , वाइल्ड लाइफ और पर्यावरण की कितनी ज्यादा फ़िक्र है और सर मुझे बहुत अच्छा लगा आपको इस नये रूप में, एक साहसी रूप में देख के। तो सर, मैं जानना चाहूंगी कि आपको इस एपिसोड के दौरान अनुभव कैसा रहा और आखिर में एक बात और जोड़ना चाहूंगी कि आपका फिटनेस लेवल देख कर हम जैसे युवा बहुत ज्यादा प्रभावित और बहुत ज्यादा मोटिवेट हुए हैं आपको इतना फिट एंड फाइन देखकर ।” सृष्टि जी आपके फ़ोन कॉल के लिए धन्यवाद। आपकी ही तरह हरियाणा में, सोहना से, के.के.पाण्डेय जी और सूरत की ऐश्वर्या शर्मा जी के साथ, कई लोगों ने डिस्कवरी चैनल पर दिखाये गये मैन वर्सेज़ वाइल्ड एपिसोड के बारे में जानना चाहा है। इस बार जब 'मन की बात' के लिए मैं सोच रहा था तो मुझे पक्का भरोसा था कि इस विषय में बहुत सारे सवाल आयेंगे और हुआ भी ऐसा ही और पिछले कुछ हफ़्तों में मैं जहाँ भी गया लोगों से मिला हूँ वहाँ मैन वर्सेज़ वाइल्ड का भी जिक्र आ ही जाता है। इस एक एपिसोड से मैं न सिर्फ हिंदुस्तान दुनिया भर के युवाओं से जुड़ गया हूँ। मैंने भी कभी सोचा नही था कि युवा दिलों में इस प्रकार से मेरी जगह बन जायेगी। मैंने भी कभी सोचा नही था कि हमारे देश के और दनिया के युवा कितनी विविधता भरी चीजों की तरफ ध्यान देते हैं। मैंने भी कभी सोचा नही था कि कभी दनिया भर के युवा के दिल को छूने का मेरी ज़िन्दगी में अवसर आयेगा। और होता क्या है ? अभी पिछले सप्ताह मैं भूटान गया थामैंने देखा है कि प्रधानमंत्री के रूप में मुझे जब से जहाँ भी जाने का अवसर मिला और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के कारण से स्थिति ये बन गई है कि दुनिया में जिस किसी के पास जाता हूँ बैठता हूँ तो कोई - न - कोई पाँच-सात मिनट तो योग के संबंध में मेरे से सवाल-जवाब करते ही करते हैं। शायद ही दुनिया का कोई बड़ा ऐसा नेता होगा जिसने मेरे से योग के संबंध में चर्चा न की हो और ये सारी दुनिया में मेरा अनुभव आया है। लेकिन इन दिनों एक नया अनुभव आ रहा है। जो भी मिलता है, जहाँ भी बात करने का मौका मिलता है। वे वाइल्डलाइफ के विषय में चर्चा करता है, पर्यावरण के सम्बन्ध में चर्चा करता है। टाइगर, लायन जीव-सृष्टि और मैं हैरान हूँ कि लोगों की कितनी रूचि होती है। डिस्कवरी ने इस कार्यक्रम को 165 देशों में उनकी भाषा में प्रसारित करने की योजना बनाई है। आज जब पर्यावरण, ग्लोबल वार्मिंग, क्लाइमेट चेंज एक वैश्विक मंथन का दौर चल रहा है। मुझे आशा है कि ऐसे में यह कार्यक्रम भारत का सन्देश, भारत की परंपरा, भारत के संस्कार यात्रा में प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, इन सारी बातों से विश्व को परिचित कराने में ये डिस्कवरी का ये एपिसोड बहुत मदद करेगा ऐसा मेरा पक्का विश्वास बन गया है और हमारे भारत में क्लाइमेट जस्टिस और क्लीन एनवायरमेंट की दिशा में उठाये गए कदमों को अब लोग जानना चाहते हैं। लेकिन एक और रोचक बात है कुछ लोग संकोच के साथ भी मुझे एक बात जरुर पूछते हैं कि मोदी जी बताइये आप हिन्दी बोल रहे थे और बेयर ग्रिल्स हिंदी जानते नहीं हैं तो इतना तेजी से आपके बीच सवांद कैसे होता था ? ये क्या बाद में एडिट किया हुआ है? ये इतना बार-बार शूटिंग हुआ है? क्या हुआ है? बड़ी जिज्ञासा के साथ पूछते हैं। देखिये, इसमें कोई रहस्य नहीं है। कई लोगों के मन में ये सवाल है, तो मैं इस रहस्य को खोल ही देता हूँ। वैसे वो रहस्य है ही नहीं। सच्चाई तो यह है कि बेयर ग्रिल्स के साथ बातचीत में टेक्नोलॉजी का भरपूर इस्तेमाल किया गया। जब मैं कुछ भी बोलता था तो तुरंत ही अंग्रेजी में समकालिक अनुवाद होता था। साथ - साथ भाषांतरण होता था और बेयर ग्रिल्स के कान में एक कॉर्डलेस छोटा सा इंस्ट्रमेंट लगा हुआ था। तो मैं बोलता था हिंदी लेकिन उसको सुनाई देता था अंग्रेजी और उसके कारण संवाद बहुत आसान हो जाता था और टेक्नोलॉजी का यही तो कमाल है। इस शो के बाद बड़ी संख्या में लोग मुझे जिम कॉर्बेट, नेशनल पार्क के विषय में चर्चा करते नजर आए हैं। आप लोग भी नेचर और वाइल्डलाइफ प्रकृति और जन्य-जीवों से जुड़े स्थलों पर जरुर जाएंमैंने पहले भी कहा है, मैं जरुर कहता हूँ आपको। अपने जीवन में नार्थ ईस्ट जरुर जाइयेक्या प्रकृति है वहाँ। आप देखते ही रह जायेंगेंआपके भीतर का विस्तार हो जाएगा। 15 अगस्त को लाल किले से मैंने आप सभी से आग्रह किया था कि अगले 3 वर्ष में, कम-से-कम 15 स्थान और भारत के अन्दर 15 स्थान और पूरी तरह 100% टूरिज्म के लिए ही ऐसे 15 स्थान पर जाएं, देखें, अध्यन करें, परिवार को लेकर जाएं, कुछ समय वहाँ बिताएं। विविधिताओं से भरा हुआ देश आपको भी ये विविधिताएं एक शिक्षक के रूप में, आपको भी, भीतर से विविधिताओं से भर देंगे। आपका अपने जीवन का विस्तार होगा। आपके चिंतन का विस्तार होगा। और मुझपे भरोसा कीजिए हिंदुस्तान के भीतर ही ऐसे स्थान हैं जहाँ से आप नई स्फूर्ति, नया उत्साह, नया उमंग, नई प्रेरणा ले करके आएंगें और हो सकता है कुछ स्थानों पर तो बार-बार जाने का मन आपको भी होगा, आपके परिवार को भी होगा। मेरे प्यारे देशवासियो, भारत में पर्यावरण की केयर और कंसर्न यानि देखभाल की चिंता स्वाभाविक नजर आ रही है। पिछले महीने मुझे देश में बाघ की जनगणना जारी करने का सौभाग्य मिला था। क्या आप जानते हैं कि भारत में कितने बाघ हैं ? भारत में बाघों की आबादी 2967 है। कुछ साल पहले इससे आधे भी बड़ी मुश्किल से थे हम। बाघों को लेकर 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में टाइगर समिट हुआ था। इसमें दुनिया में बाघों की घटती संख्या को लेकर चिंता जाहिर करते हुए एक संकल्प लिया गया था। यह संकल्प था 2022 तक पूरी दुनिया में बाघों की संख्या को दोगुना करना। लेकिन यह न्यू इंडिया है हम लक्ष्यों को जल्दी से जल्द पूरा करते हैं। हमनें 2019 में ही अपने यहाँ टाइगर की संख्या दोगुनी कर दी। भारत में सिर्फ बाघों की संख्या ही नहीं बल्कि प्रोटेक्टेड एरियाज और कम्युनिटी रेज़र्वस की संख्या भी बढ़ी हैं। जब मैं बाघों का डाटा रिलीज़ कर रहा था तो मुझे गुजरात के गीर के शेर की भी याद आई। जब मैंने वहाँ मुख्यमंत्री का दायित्व संभाला था। तब गीर की जंगलों में शेरों का हैबिटेट सिकुड़ रहा थाउनकी संख्या कम होती जा रही थीहमनें गीर में एक के बाद एक कई कदम उठाए। 2007 में वहाँ महिला गार्ड्स को तैनात करने का फैसला लिया। पर्यटन को बढ़ाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार किएजब भी हम प्रकृति और वन्य-जीवों की बात करते हैं तो केवल कंज़र्वेशन की ही बात करते हैं। लेकिन, अब हमें कंज़र्वेशन से आगे बढ़ कर कम्पैशन को लेकर सोचना ही होगा। हमारे शास्त्रों में इस विषय में भी बहुत अच्छा मार्गदर्शन मिला है। सदियों पहले हमारे शास्त्रों में हमनें कहा है :


निर्वनो बध्यते व्याघ्रो, निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम।


तस्माद् व्याघ्रो वनं रक्षेत्, वनं व्याघ्रं न पालयेत् ।।


अर्थात, यदि वन न हों तो बाघ मनुष्य की आबादी में आने को मजबूर हो जाते हैं और मारे जाते हैं और यदि जंगल में बाघ न हों तो मनुष्य जंगल काटकर उसे नष्ट कर देता है इसलिए वास्तव में बाघ वन की रक्षा करता है, न कि, वन बाघ की - कितने उत्तम तरीके से विषय को हमारे पूर्वजों ने समझाया है। इसलिए हमें अपने वनों, वनस्पतियों और वन्य जीवों का न केवल संरक्षण करने की आवश्यकता है बल्कि ऐसा वातावरण भी बनाना होगा जिससे वे सही तरीके से फल-फूल सकें। मेरे प्यारे देशवासियो, 11 सितम्बर, 1893 स्वामी विवेकानंद जी का ऐतिहासिक भाषण कौन भूल सकता है। पूरे विश्व की मानव जाति को झकझोर करने वाला भारत का ये युवा सन्यासी दुनिया के अन्दर भारत की एक तेजस्वी पहचान छोड़ करके आ गया। जिस गुलाम भारत की तरफ दुनिया बड़ी विकृत भाव से देख रही थी। उस दुनिया को 11 सितम्बर, 1893 स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष के शब्दों ने दुनिया को भारत की तरफ देखने का नज़रिया बदलने के लिए मजबूर कर दिया। आइये, स्वामी विवेकानंद जी ने जिस भारत के रूप को देखा थास्वामी विवेकानंद जी ने भारत के जिस सामर्थ्य को जाना था। हम उसे जीने की कोशिश करें। हमारे भीतर है, सबकुछ है। आत्मविश्वास के साथ चल पड़ें। मेरे प्यारे देशवासियो, आप सभी को याद होगा कि 29 अगस्त को राष्ट खेल दिवस' के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर हम देश भर में फिट इंडिया मूवमेंट लॉन्च करने वाले हैं। खुद को फिट रखना है। देश को फिट बनाना है। हर एक के लिए बच्चे, बुजुर्ग, युवा, महिला सब के लिए ये बड़ा रोचक अभियान होगा और ये आपका अपना होगा। लेकिन उसकी बारीकियां आज मैं बताने नहीं जा रहा हूँ। 29 अगस्त का इंतजार कीजिये। मैं खुद उस दिन विस्तार से विषय में बताने वाला है और आपको जोड़े बिना रहने वाला नहीं हूँक्योंकि आपको मैं फिट देखना चाहता हूँ। आपको फिटनेस के लिए जागरूक बनाना चाहता हूँ और फिट इंडिया के लिए देश के लिए हम मिल करके कुछ लक्ष्य भी निर्धारित करें। मेरे प्यारे देशवासियो, मुझे आपका इंतजार रहेगा 29 अगस्त को फिट इंडिया में। सितम्बर महीने में पोषण अभियान' मेंऔर विशेषकर 11 सितम्बर से 02 अक्टूबर 'स्वच्छता अभियान' में। और 02 अक्टूबर टोटली डेडिकेटेड प्लास्टिक के लिए। प्लास्टिक से मुक्ति पाने के लिए हम सब, घर, घर के बाहर सब जगह से पूरी ताकत से लगेंगे और मुझे पता है ये सारे अभियान सोशल मीडिया में तो धूम मचा देंगेआइये, एक नए उमंग, नए संकल्प, नई शक्ति के साथ चल पड़ें। मेरे प्यारे देशवासियो, आज 'मन की बात' में इतना ही। फिर मिलेंगेमैं आपकी बातों का, आपके सुझावों का इंतजार करूँगा। आइये, हम सब मिल करके आजादी के दीवानों के सपनों का भारत बनाने के लिए गांधी के सपनों को साकार करने के लिए चल पड़ें _ 'स्वान्तः सुखायः' भीतर के आनंद को सेवा भाव से प्रकट करते हुए चल पड़ें।


बहुत-बहुत धन्यवाद।


नमस्कार।


 


 


 


 


 


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