दत्तोपंत ठेंगड़ी व्याख्यानमाला के माध्यम से विधि का हुआ मनन
卐 उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय के प्रतिपादित सिद्धांतों का हुआ उल्लेख।

 


 

कानपुर (का उ सम्पादन)। अधिवक्ता परिषद उत्तर प्रदेश - उत्तराखण्ड के संयोजन से दत्तोपंत ठेंगडी  व्याख्यानमाला में गुरूवार 28 मई के व्याख्यान के वक्ता अमरेन्द्र नाथ सिंह वरिष्ठ अधिवक्ता, उच्च न्यायालय इलाहाबाद ने अवमानना विधि विषय पर स्वाध्याय मण्डल में बहुत ही सरल व सारगर्भित शब्दों में बताया कि लोकतंत्र के तीन महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं जिसमें न्यायपालिका का अपना विशेष स्थान है। जब तक प्रजा में भय नहीं होगा तब तक वह व्यवस्था को स्वीकार नहीं करती क्योंकि भय बिन होय न प्रीत इसलिए न्यायपालिका के आदेशों, निर्णयों का पालन न करना न्यायालय अवमानना होती है। जिस प्रकार परिवार का मुखिया घर के सदस्यों को कुछ करने को कहता है और वह उस आदेश की अवज्ञा करे और उसके लिए दण्ड मिले तो यह अवमानना है। समाज में अनुशासनहीनता उत्पन्न न हो इसलिए दण्ड जरूरी है। यह दो प्रकार का है सिविल व क्रिमिनल अवमानना। सिविल मामले में न्यायलय के आदेश, डिक्री, निर्णय की अवहेलना पर दूसरा पक्षकार प्रार्थनापत्र देकर न्यायालय को इस बारे सूचित कर सकता है फिर यह उस व्यक्ति व न्यायालय के मध्य की बात है। क्रिमिनल मामलों में जानबूझकर, बदनीयती से न्यायालय की कार्यवाही को रोका जाना उदंडता करना या अखबार में उसके विरुद्ध ऊटपटांग टिप्पणी करना, न्यायालय कक्ष में या न्यायाधीश से झगड़ा करना, न्याय कक्ष में अपशब्द बोलना या न्यायालय के आदेश का जानबूझ कर अनुपालन नहीं करना आवमनाना कहलाती है इसमें न्यायालय स्वंय सज्ञान ले कर अधिवक्ता को या सामान्य व्यक्ति को अवमानना नोटिस जारी कर सकता है या तत्काल दण्डित विचरण किसी सक्षम न्यायलय में स्थानांतरित करता है। ये न्यायालय पर निर्भर हैै दोनों अवमानना की दशा में 6 माह सजा व 2000 रुपए जुर्माने का प्रावधान है किंतु पीड़ित को नैसर्गिक न्याय के तहत सुनवाई के अवसर देगी वह दूसरे न्यायलय में भी सुनवाई के लिए बोल सकता है। यह भी बताना जरूरी है कि आवमनाना न्यायालय व जिसने आवमनाना करी है उसके मध्य का मामला है कोई व्यक्ति जो आवमनाना हेतु प्रार्थना पत्र देने वाले व्यक्ति आवमनाना के मामले पर केवल सूचना दाता की स्थिति में होता है। बहुत सारे उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय के प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि कुछ मामलों में न्यायलय द्वारा अधिवक्ताओं को उनके किये गए कृत्य से अधिक दण्ड दिया गया जोकि सही नहीं है। अधिवक्ता की आवाज दबाने की कोशिश यदि न्यायलय ने की तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है और इससे वादकारियों का नुकसान होगा। दत्तोपंत ठेंगड़ी व्याख्यानमाला के माध्यम से अधिवक्ताओं में बौद्धिक गति बनी रहे इसीलिए विधि का मनन किया जा रहा है। सजीव प्रसारण में अधिवक्ता परिषद के कार्यकारी प्रदेश महामंत्री अश्वनी कुमार त्रिपाठी, घनश्याम किशोर, राजेन्द्र जी, ज्योति मिश्रा, पवन तिवारी, संगीता गुप्ता, ज्योति राव दुबे, पूजा, रिंकू, संजय शुक्ला, अनिल दीक्षित, राजीव शुक्ला, देवालय चौधरी, सुशील, विनय, देव नारायण, आदि अन्य अधिवक्ताओं की उपस्थित रही। उत्तर प्रदेश के 22 हज़ार अधिवक्ताओं ने यू ट्यूब, फेसबुक व अन्य माध्यमो से सजीव प्रसारण को देखा।