उ. प्र. और तमिलनाडु में एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से दूर नहीं डिफेन्स कॉरिडोर

 महत्वपूर्ण हथियार प्रणालियों और तकनीक में रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए आत्मानिर्भर बनना एक आवश्यकता : लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह


व्याख्यान के कुछ अंश -

> सशस्त्र बलों को सीमावर्ती क्षेत्रों में युद्ध लड़ने की क्षमताओं को बढ़ाने की आवश्यकता में योगदान दे रहा है आई.आई.टी.

> एक इंटीग्रेटेड सिविल और डिफेन्स ईकोसिस्टम, सियाचिन जैसे उच्च ऊंचाई वाले पृथक क्षेत्रों में समाधान हो सकता है।

> माइक्रो टनलिंग क्षेत्र पर हमें ध्यान देने की जरूरत है।

> बेहद कम लागत पर कैमो क्षमताओं को बदलने का एक जबरदस्त समाधान देने का प्रयास मेटामटेरियल पर आई.आई.टी. कानपुर अनुसंधान समूह के साथ सेना कर रही है।

> अपतटीय और तटवर्ती दोनों समुद्री संरचनाओं के निर्माण के क्षेत्र में सेना को आई.आई.टी. के साथ सहयोग की अपेक्षा है।

> कॉम्बैट इंजीनियर को बहुत ही बेसिक हार्डवेयर पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

> सशस्त्र बलों को सशक्त बनाने और उन्हें मजबूत बनाने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है।

> व्यक्तिगत दृष्टिकोण के बजाय समूहों में कार्य करना आवश्यक है।

डिफेन्स में इंजीनियरों के चार स्तंभ –
- कॉम्बैट इंजीनियरिंग - मोबिलिटी
- एम.ई.एस.
- डिजास्टर मैनेजमेंट
- बी.आर.ओ.
 
लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह, पी.वी.एस.एम., ए.वी.एस.एम., वी.एस.एम.

दैनिक कानपुर उजाला
कानपुर। आई.आई.टी. कानपुर में प्रथम वर्ष के छात्रों के लिए प्रेरक व्याख्यान की श्रृंखला में, इस बार अतिथि वक्ता पी.वी.एस.एम., ए.वी.एस.एम., वी.एस.एम. इंजीनियर - इन - चीफ भारतीय सेना, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खडकवासला के पूर्व छात्र लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह थे। उन्होंने "भविष्य की क्षमता और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए इंजीनियरों और अनुसंधान संस्थानों के कोर क्षेत्र के प्रयासों के तालमेल" पर बात की। आई.आई.टी. कानपुर में एन.सी.सी. के ऑफिसर - इंचार्ज कर्नल अशोक मोर ने अतिथि वक्ता लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह का स्वागत किया। संस्थान के छात्र सिद्धार्थ गोविल ने अतिथि वक्ता का परिचय दिया। जनरल अमेरिका की वर्जीनिया स्टेट यूनिवर्सिटी से डबल एम - टेक कर चुके हैं। मैनेजमेंट स्टडीज और एम.फिल (डिफेन्स स्टडीज) में परास्नातक और डी.जी. बॉर्डर रोड रहे हैं। लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने छात्रों को अपने संबोधन में कहा कि, "बुनियादी ढांचे का विकास इंजीनियरों की ताकत है और इसे सिविल, मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों द्वारा संचालित किया जाता है, जिसमें जियो स्ट्रेटेजिक वातावरण को ध्यान में रखते हुए भारतीय सशस्त्र बल काम कर रहे हैं। आई.आई.टी. जैसे विभिन्न अनुसंधान संस्थान हमारे सशस्त्र बलों को आत्मनिर्भर बनाकर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (ए.आई.), ड्रोन आदि में सक्रिय भागीदारी करके विशेष रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों में युद्ध लड़ने की क्षमताओं को बढ़ाने की आवश्यकता में योगदान दे रहे हैं। सेना में इंजीनियरों के चार स्तंभ – कॉम्बैट इंजीनियरिंग - मोबिलिटी, सबसे दुर्गम और कठिन इलाकों में ब्रिजिंग। हाल ही के स्टैंडऑफ के दौरान एक अत्यंत कॉम्पैक्ट रूप में निर्मित डिफेन्स इंफ्रास्ट्रक्चर जिसने सैनिकों की लंबे समय तक तैनाती को सक्षम किया है; डिजास्टर मैनेजमेंट - विभिन्न आपदाओं में प्रथम प्रतिक्रिया कर्ता; बम और डिस्पोजल का काम कॉम्बैट इंजीनियरों द्वारा किया जाता है; बी.आर.ओ. - अटल सुरंग, स्टैंडऑफ के दौरान त्वरित लामबंदी, बर्फ निकासी, एन.एच.ए.आई. के साथ भारत चीन रणनीतिक सड़कें; एम.ई.एस. (मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज) - देश की सबसे बड़ी निर्माण एजेंसी। अस्पतालों का निर्माण, एयर फील्ड्स, आर्मी अफसर स्पेशलाइजेशन के लिए हर साल आई.आई.टी. से एम-टेक करते हैं। पूर्वी हवाई पट्टियों के लिए समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर, सौर फोटोवोल्टिक कार्यों की दिशा में कार्य करना। एम.ई.एस. और आई.आई.टी. कंस्ट्रक्शन टेक्नोलॉजी की नेक्स्ट जनरेशन शुरुआत के लिए मिलकर काम कर सकते हैं; मिलिट्री सर्वे - सैटेलाइट इमेजरी, ऑप्टिकल और रडार सेंसर के साथ यू.ए.वी.। उन्होंने कहा कि असॉल्ट ब्रिज के मामले में - डी.आर.डी.ओ. और इंजीनियरिंग इंडस्ट्री का सक्रीय सहयोग। रॉ मटेरियल यदि पर्याप्त नहीं है तो डिजाइन विदेशों से अनुकूलित किया जाता है। हाई मोबिलिटी व्हीकल अर्ध या पूरी तरह से लॉक्ड किट में आते हैं और केवल स्थानीय रूप से असेंबल किए जाते हैं। डी.आर.डी.ओ. और उद्योग की सक्रिय भागीदारी के साथ हम महत्वपूर्ण लड़ाकू विमानों और परिवहन विमानों के लिए शक्तिशाली इंजन प्लेटफॉर्म के निर्माण पर काम कर सकते हैं। लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने कहा कि, "मुझे आश्चर्य है कि अगर हम मंगल पर मिशन लॉन्च कर सकते हैं तो हम शक्तिशाली इंजन बनाने की स्थिति में क्यों नहीं हैं" इसरो आत्मनिर्भरता का प्रतीक है और नासा इसकी सफलता का श्रेय भारतीय दिमाग को देता है। हम आगामी तकनीकी कार्यों में पूर्ण परिवर्तन के लिए काम करने के लिए आई.आई.टी. के सर्वश्रेष्ठ और उज्ज्वल दिमाग के साथ सहयोग की आशा करते हैं। एक इंटीग्रेटेड सिविल और डिफेन्स ईकोसिस्टम, सियाचिन जैसे उच्च ऊंचाई वाले पृथक क्षेत्रों में नेक्स्ट - जनरेशन इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के साथ, ऑक्सीजन सिलेंडर, फ्यूल्स सेल, जल उत्पादन, दैनिक जरूरतों के बुनियादी ढांचे, अत्यधिक हिमपात और बर्फीला तूफान के दौरान जीवित रहने की क्षमता के साथ स्थानांतरित करने योग्य आवास प्रदान करने के लिए समाधान हो सकता है l बी.आर.ओ. द्वारा निर्माण की गति को बढ़ाया जा सकता है, भारी सड़क निर्माण संयंत्रों के निर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और मशीनरी को बहुत तेजी से शुरू करने की आवश्यकता है, यहीं पर अकादमिक क्षेत्र के लोग सक्रिय रूप से हमारी प्रयोगशालाओं और चल रही परियोजना स्थलों में हमारे साथ जुड़ सकते हैं। माइक्रो टनलिंग मशीनों में जबरदस्त क्षमता है जिसका उपयोग भूमिगत खुदाई वाले क्षेत्र की रक्षा के निर्माण के लिए किया जा सकता है जो भारी बमबारी का सामना करता है। इससे हमारे जवानों को सुरक्षा मिलेगी। यह एक और क्षेत्र है जिस पर हमें ध्यान देने की जरूरत है। 3डी प्रिंटिंग रोबोटिक निर्माण के साथ शामिल बंकरों का निर्माण और मानव हस्तक्षेप को कम करके दुर्गम इलाके में वैकल्पिक हल्के निर्माण सामग्री का उपयोग, ग्रेटर बैलिस्टिक संरक्षण अधिक शोध के योग्य है। विभिन्न प्रकार के कंपोजिट पर शोधकार्य, सी.एम.ई., पुणे में चल रहा है। सर्वत्र कवच, मानव रहित आई.ई.डी. निपटान रिमोट ऑपरेटेड व्हीकल (आर.ओ.वी.), एंटी माइन बूट, बैलिस्टिक हेलमेट में सहयोग की बहुत बड़ी गुंजाइश है। ऑटो स्टेम जैसे आधुनिक विस्फोटकों की नेक्स्ट जनरेशन को ऐसी चीजों पर काम करने की जरूरत है जिनमें बहुत अधिक विनाशकारी विस्फोटक शक्ति हो। सैटेलाइट इमेजरी और अन्य आधुनिक तकनीक का उपयोग करके धोखे और छलावरण (कामोफ्लाज) की स्थिति से बचने के लिए समाधान प्रस्तुत करने की भी जरुरत है l हम मेटामटेरियल पर आई.आई.टी. कानपुर अनुसंधान समूह के साथ सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं जो बेहद कम लागत पर कैमो क्षमताओं को बदलने का एक जबरदस्त समाधान देने का प्रयास कर रहा है। हमें इस दिशा में और अधिक द्रढ़ता के साथ मिलकर चलने की जरूरत है। बारूदी सुरंगों का पता लगाना हमेशा एक चुनौती होती है। उच्च तकनीकी - उन्नत विकल्प पर शोध समय की आवश्यकता है। हम अपतटीय और तटवर्ती दोनों समुद्री संरचनाओं के निर्माण के क्षेत्र में आई.आई.टी. के साथ सहयोग करना चाहते हैं। कुछ क्षेत्रों में शिक्षाविद सीमा पर भू-विशेष डेटा की सटीकता में सुधार और पड़ोसी देशों के जियोलाइन मॉडल के विकास में हमारी मदद कर सकते हैं। सर्वत्र हमारा आदर्श वाक्य है जिसका तात्पर्य सर्वव्यापिता है। जबकि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (ए.आई.) और 5जी के उपयोग में उन्नत शोध हो रहे हैं, एक अग्रणी या कॉम्बैट इंजीनियर को बहुत ही बेसिक हार्डवेयर पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। हमें सशस्त्र बलों को सशक्त बनाने और उन्हें मजबूत बनाने के लिए मिलकर काम करने की जरूरत है। सैन्य शक्ति के लिए तकनीक पर शोध करने के लिए सीमा अनंत है। हाइपरसोनिक टॉक वेव्स नैनोटेक महत्वपूर्ण तकनीक है जो अनुसंधान के योग्य है। हम लगातार फॉरवर्ड और फ्रीक्वेंट दौरे करने की अनुशंसा करते हैं क्यूंकि बेहतर ढंग से समझने और काम करने के लिए व्यक्तिगत दृष्टिकोण के बजाय समूहों में कार्य करना आवश्यक है। स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता से लागत में कमी आती है और नई तकनीक को शामिल करते समय यह हमेशा एक निर्णायक कारक होगा। हमें आई.आई.टी. और कॉम्बैट इंजीनियरों के बीच सीधे जुड़ाव को मजबूत करने की जरूरत है। आई.आई.टी. मद्रास, भुवनेश्वर और गांधीनगर में विभिन्न परियोजनाएं चल रही हैं। अनुसंधान का उद्देश्य हमारी क्षमताओं की मात्रा में वृद्धि करना होना चाहिए। कार्यात्मक सैन्य परिसर- डिफेन्स कॉरिडोर, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में वर्तमान में आर्थिक अवसर का लाभ उठाने और एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के उद्देश्य से दूर नहीं हैं l महत्वपूर्ण हथियार प्रणालियों और तकनीक के लिए विदेशी देशों पर निर्भरता के बिना रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए आत्मनिर्भर बनना एक आवश्यकता है। लेफ्टिनेंट जनरल हरपाल सिंह ने छात्रों और आई.आई.टी. कानपुर समुदाय को संबोधित करने के अवसर के लिए धन्यवाद दिया। कर्नल अशोक मोर ने इस प्रेरक व्याखान के लिए स्पीकर को धन्यवाद ज्ञापित किया।  

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